पुराने फैशन से लेकर बदले हुए चेहरे तक, हर उम्र के लोग बन रहे 80 के दशक के नायक
परिवर्तन टुडे न्यूज, चंदौली। इन दिनों इंटरनेट पर 80 के दशक की तस्वीरों की धूम मची हुई है। सामाजिक माध्यमों पर ऐसी तस्वीरें तेजी से प्रसारित हो रही हैं, जिनमें लोग पुराने दौर के कपड़ों, बड़े चश्मों, लंबे बालों और उस समय के आकर्षक अंदाज में नजर आ रहे हैं। हालांकि इन तस्वीरों का असली आकर्षण केवल पुराने फैशन में नहीं, बल्कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता द्वारा चेहरे और व्यक्तित्व में किए जा रहे बदलाव में है।
जिस व्यक्ति का पेट निकला हुआ है, वह तस्वीर में बिल्कुल पतला और चुस्त दिखाई दे रहा है। जिसके सिर पर बाल नहीं हैं, उसके सिर पर घनी जुल्फें नजर आ रही हैं। उम्र चाहे जितनी हो, कृत्रिम बुद्धिमत्ता कुछ ही क्षणों में व्यक्ति को 80 के दशक के युवा नायक के रूप में प्रस्तुत कर दे रही है। अपने बदले हुए सुंदर रूप को देखकर भला कौन प्रसन्न नहीं होगा।
पहले प्रसिद्ध चेहरे, अब आम आदमी भी हुआ इस प्रयोग का हिस्सा
शुरुआत में फिल्मी सितारों ने ऐसी तस्वीरें साझा कीं। इसके बाद राजनेता और सामाजिक माध्यमों से जुड़े चर्चित लोग भी इस चलन का हिस्सा बने और अब आम आदमी भी पूरी तरह इसकी ओर आकर्षित हो रहा है।
डॉ. विनय प्रकाश तिवारी के अनुसार यह केवल तस्वीरों का चलन भर नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक बड़े सामाजिक और तकनीकी बदलाव की शुरुआत दिखाई देती है। भविष्य में जब कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इतिहास को लिखा जाएगा, तो संभव है कि उसमें यह भी दर्ज हो कि आम लोगों ने कृत्रिम बुद्धिमत्ता का सबसे व्यापक इस्तेमाल किसी कठिन वैज्ञानिक कार्य के लिए नहीं, बल्कि स्वयं को 80 के दशक के नायक के रूप में देखने के लिए किया था।
मनुष्य की जिज्ञासा बनी कृत्रिम बुद्धिमत्ता के प्रयोग की पहली सीढ़ी
उन्होंने कहा कि किसी ने विज्ञान का कठिन प्रश्न नहीं पूछा, किसी ने व्यापार की योजना नहीं बनाई। सबसे पहले लोगों के मन में यही जिज्ञासा पैदा हुई कि यदि उनके सिर पर घने बाल होते, पेट अंदर होता और वे 80 के दशक में जवान होते तो आखिर कैसे दिखाई देते।
बात भले ही मनोरंजन से शुरू हुई हो, लेकिन इसी बहाने कृत्रिम बुद्धिमत्ता आम आदमी के मोबाइल और उसकी सोच—दोनों में प्रवेश कर चुकी है।
चिट्ठी से मोबाइल तक और अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक का सफर
यदि तकनीकी बदलावों के इतिहास को देखें तो कभी लोगों को चिट्ठियों के जवाब का इंतजार रहता था। इसके बाद सार्वजनिक दूरभाष केंद्र आया, घरों में दूरभाष लगे, फिर संदेश भेजने वाले उपकरण आए और मोबाइल ने पूरी व्यवस्था बदल दी। बड़े-बड़े संगणक छोटे होकर चलायमान संगणक बने और फिर हाथ में आने वाले उपकरणों ने तकनीक को हर व्यक्ति तक पहुंचा दिया।
इंटरनेट, एंड्रॉयड, सामाजिक माध्यम और लघु वीडियो धीरे-धीरे हमारे दैनिक जीवन का हिस्सा बन गए। शुरुआत में हर नई तकनीक लोगों को अजीब लगी। किसी ने उसका मजाक उड़ाया तो किसी ने उसे बेकार बताया, लेकिन समय के साथ उन्हीं तकनीकों ने हमारे काम करने, सीखने और संवाद करने का तरीका बदल दिया।
आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता भी इसी परिवर्तन की अगली कड़ी बनती दिखाई दे रही है।
बच्चों को रोकने के बजाय सही दिशा में उपयोग सिखाने की जरूरत
डॉ. तिवारी का कहना है कि बच्चों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता का प्रयोग करते देखकर केवल डांटकर उनसे इसे दूर करने के बजाय अभिभावकों को उनके साथ बैठना चाहिए, स्वयं इसके बारे में समझना चाहिए और बच्चों को इसके सही एवं रचनात्मक उपयोग की शिक्षा देनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि आज हम किसी कुशल संगणक विशेषज्ञ को देखकर सोचते हैं कि काश हमें भी इतनी तकनीकी जानकारी होती। कई बार मन में यह भी आता है कि बचपन में सीखने का अवसर क्यों नहीं मिला। आने वाले समय में कहीं हमारे बच्चे भी ऐसा न कहें कि उन्हें कृत्रिम बुद्धिमत्ता सीखनी थी, लेकिन माता-पिता ने मोबाइल ही छीन लिया।
बदलते समय को समझना ही भविष्य की तैयारी
उन्होंने कहा कि 80 के दशक की तस्वीर बनाने से शुरू हुआ यह मनोरंजक प्रयोग वास्तव में लोगों को कृत्रिम बुद्धिमत्ता की क्षमता से परिचित कराने का माध्यम बन गया है। आवश्यकता इस बात की है कि इसे केवल मनोरंजन तक सीमित न रखा जाए, बल्कि शिक्षा, रोजगार, व्यवसाय, रचनात्मकता और ज्ञान के क्षेत्रों में इसके उपयोग को समझा जाए।
समय लगातार आगे बढ़ रहा है। ऐसे में बदलती तकनीक से दूरी बनाने के बजाय उसे समझना और उसका सही उपयोग सीखना ही भविष्य की तैयारी है। जो समाज समय के बदलाव को समझकर उसके साथ आगे बढ़ता है, वही आने वाले दौर में अपनी मजबूत जगह बना पाता है।
— डॉ. विनय प्रकाश तिवारी
संस्थापक – डैडीज इंटरनेशनल स्कूल
संस्थापक – एलटीपी कैलकुलेटर




