spot_img
23.4 C
Varanasi
Tuesday, October 20, 2026
spot_img
spot_img

Chandauli news- दशहरा विशेष: हर साल जलता है रावण, फिर समाज में क्यों जिंदा हैं बुराइयां?

spot_img
जरुर पढ़े
रजनी कांत पाण्डेय
रजनी कांत पाण्डेय
मैं रजनीकांत पाण्डेय पिछले कई वर्षो से पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़ा हूँ इस दौरान कई राष्ट्रिय हिंदी दैनिक समाचार पत्रों में कार्य करने के उपरान्त ख़बरों के डिजिटल माध्यम को चुना है,मेरा ख़ास उद्देश्य जन सरोकार की खबरों को प्रमुखता से उठाना है एवं न्याय दिलाना है जिसमे आपका सहयोग प्रार्थनीय है.

परिवर्तन टुडे न्यूज, चंदौली। विजयादशमी केवल रावण के पुतले का दहन करने और उत्सव मनाने का पर्व नहीं, बल्कि अपने भीतर छिपी बुराइयों को पहचानने, उनका त्याग करने और सत्य के मार्ग पर चलने का संकल्प लेने का अवसर है। भगवान श्रीराम की विजय हमें सिखाती है कि अहंकार, अन्याय और अधर्म चाहे कितने ही शक्तिशाली क्यों न दिखाई दें, अंततः सत्य और सदाचार का मार्ग ही श्रेष्ठ होता है। लेकिन आज के सामाजिक परिवेश में एक गंभीर प्रश्न खड़ा होता है—क्या हम वास्तव में विजयादशमी के आदर्शों को अपने जीवन में उतार रहे हैं, या फिर रावण का पुतला जलाकर अपने भीतर की बुराइयों को जीवित छोड़ दे रहे हैं?

पुतला रावण का जलता है, लेकिन भीतर की बुराइयों का क्या?

हर वर्ष विजयादशमी पर मैदानों में रावण के विशाल पुतले जलाए जाते हैं। आतिशबाजी होती है, जय श्रीराम के उद्घोष गूंजते हैं और बुराई पर अच्छाई की विजय का उत्सव मनाया जाता है। लेकिन पर्व की वास्तविक सार्थकता केवल इन आयोजनों तक सीमित नहीं है। इसका मूल संदेश मनुष्य के आचरण, विचार और व्यवहार में परिवर्तन लाना है।

रावण केवल रामायण का एक पात्र नहीं, बल्कि अहंकार, अन्याय, छल, कपट और अनैतिकता जैसी बुराइयों का प्रतीक भी है। यदि हम अपने व्यवहार में इन बुराइयों को स्थान देते रहेंगे, तो हर वर्ष रावण का पुतला जलाने के बावजूद उसके प्रतीक हमारे भीतर जीवित रहेंगे।

ईमानदारी संघर्ष में, बेईमानी प्रभाव में—यह कैसी सामाजिक विडंबना?

आज के सामाजिक परिवेश में कई बार ऐसी स्थितियां देखने को मिलती हैं, जहां ईमानदारी से जीवन बिताने वाला व्यक्ति अपने अधिकारों और सम्मान के लिए संघर्ष करता नजर आता है, जबकि गलत रास्तों से आगे बढ़ने वाला व्यक्ति अपने प्रभाव, धन और पहुंच के कारण प्रतिष्ठा प्राप्त कर लेता है।

चरित्र से अधिक दिखावे, योग्यता से अधिक प्रभाव और सत्य से अधिक स्वार्थ को महत्व मिलने की प्रवृत्ति समाज के लिए चिंता का विषय है। नियमों का पालन करने वाला व्यक्ति यदि व्यवस्था के सामने स्वयं को असहाय महसूस करे और नियमों को तोड़ने वाला व्यक्ति अपने प्रभाव के बल पर आगे बढ़ जाए, तो यह केवल किसी एक व्यक्ति की समस्या नहीं, बल्कि सामाजिक मूल्यों के सामने खड़ा गंभीर प्रश्न है।

हालांकि, आज भी समाज में ऐसे असंख्य लोग हैं, जो कठिन परिस्थितियों के बावजूद ईमानदारी और नैतिकता का दामन नहीं छोड़ते। यही लोग समाज की वास्तविक शक्ति हैं।

सच जानते हुए मौन रहना भी अन्याय को बढ़ावा देता है

समाज में असत्य को बढ़ावा तब मिलता है, जब लोग गलत होते देखकर भी उसके विरुद्ध आवाज उठाने से बचते हैं। कहीं संबंध बिगड़ने का भय, कहीं प्रतिष्ठा प्रभावित होने की चिंता और कहीं अपने स्वार्थ की रक्षा की इच्छा लोगों को मौन रहने के लिए विवश कर देती है।

लेकिन विचार करने योग्य प्रश्न यह है कि यदि हर व्यक्ति अपने लाभ के लिए सत्य से मुंह मोड़ ले, तो न्याय की रक्षा कौन करेगा? यदि अन्याय का सामना करने वाला व्यक्ति अकेला छोड़ दिया जाए, तो समाज में नैतिकता की स्थापना कैसे होगी?

सत्य के पक्ष में खड़े होने का अर्थ विवाद उत्पन्न करना नहीं, बल्कि उचित और अनुचित के बीच अंतर को पहचानना तथा विवेकपूर्ण ढंग से सही का साथ देना है। समाज में बदलाव तभी संभव है, जब गलत को गलत कहने का साहस फिर से जागृत हो।

रिश्तों में विश्वास की जगह स्वार्थ ले रहा है?

परिवार और सामाजिक संबंध किसी भी सभ्य समाज की आधारशिला होते हैं। रिश्तों की मजबूती विश्वास, त्याग, समर्पण, सम्मान और जिम्मेदारी से बनी रहती है। जब इन मूल्यों का स्थान स्वार्थ और निजी लाभ लेने लगते हैं, तब संबंधों की आत्मीयता प्रभावित होने लगती है।

आज कई बार रिश्तों में अपने हित को प्राथमिकता देने, जिम्मेदारियों से बचने और दूसरे की भावनाओं की अनदेखी करने जैसी प्रवृत्तियां दिखाई देती हैं। उचित-अनुचित का विचार पीछे छूट जाता है और सामाजिक मर्यादाओं को पुरानी सोच कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता है।

यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि आधुनिक समाज के सभी संबंध ऐसे नहीं हैं। आज भी अनेक परिवारों में प्रेम, त्याग, संस्कार और परस्पर सम्मान की परंपरा जीवित है। आवश्यकता इन मूल्यों को कमजोर करने की नहीं, बल्कि उन्हें नई पीढ़ी तक पहुंचाने की है।

आधुनिकता जरूरी, लेकिन नैतिकता की कीमत पर नहीं

समय के साथ बदलना और आधुनिकता को अपनाना प्रगति का संकेत है। शिक्षा, विज्ञान, तकनीक और स्वतंत्र विचारों ने समाज को नई दिशा दी है। लेकिन आधुनिकता का अर्थ अपनी जिम्मेदारियों को भूल जाना या दूसरों की गरिमा की अनदेखी करना नहीं हो सकता।

स्वतंत्रता के साथ जिम्मेदारी और अधिकारों के साथ कर्तव्य भी जुड़े होते हैं। किसी व्यक्ति की वास्तविक प्रगति तभी मानी जा सकती है, जब उसके व्यवहार में संवेदनशीलता, विवेक और दूसरों के प्रति सम्मान बना रहे।

समाज को यह समझना होगा कि विकास केवल आर्थिक समृद्धि, ऊंचे पद या बाहरी चमक-दमक से नहीं मापा जाता। किसी समाज की वास्तविक पहचान इस बात से होती है कि वहां सत्य, न्याय, ईमानदारी और मानवीय गरिमा को कितना महत्व दिया जाता है।

विजयादशमी का वास्तविक अर्थ आत्ममंथन में छिपा है

विजयादशमी के अवसर पर प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं से कुछ प्रश्न अवश्य पूछने चाहिए—क्या हमने अपने अहंकार को नियंत्रित किया? क्या हमने किसी के साथ छल या अन्याय करने से स्वयं को रोका? क्या हमने किसी कमजोर व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा के लिए आवाज उठाई? क्या हमने अपने रिश्तों में ईमानदारी और सम्मान बनाए रखा?

यदि इन प्रश्नों के उत्तर आत्ममंथन के लिए प्रेरित करते हैं, तो यही पर्व की सबसे बड़ी उपलब्धि होगी। केवल दूसरों की बुराइयां गिनाने से समाज नहीं बदलता। परिवर्तन की शुरुआत अपने विचारों, व्यवहार और निर्णयों से करनी होती है।

जब परिवारों में संस्कारों को महत्व मिलेगा, कार्यक्षेत्रों में ईमानदारी का सम्मान होगा, सामाजिक संबंधों में पारदर्शिता आएगी और अन्याय के विरुद्ध खड़े होने का साहस बढ़ेगा, तभी विजयादशमी का संदेश वास्तविक जीवन में दिखाई देगा।

रावण दहन के साथ बुराइयों के अंत का भी लें संकल्प

दशहरा हमें याद दिलाता है कि बुराई चाहे कितने ही मुखौटे पहन ले, उसका समर्थन नहीं किया जाना चाहिए। सत्य का मार्ग कठिन हो सकता है, लेकिन समाज की स्थायी नींव उसी पर खड़ी होती है। अन्याय के सामने मौन रहने के बजाय न्याय का साथ देना और निजी स्वार्थ से ऊपर उठकर मानवीय मूल्यों की रक्षा करना ही इस पर्व की सच्ची प्रेरणा है।

आज आवश्यकता केवल रावण के पुतले का दहन करने की नहीं, बल्कि अपने भीतर पल रहे अहंकार, छल, कपट, स्वार्थ और अन्याय की प्रवृत्तियों को समाप्त करने की है। समाज में परिवर्तन तभी आएगा, जब व्यक्ति स्वयं अपने आचरण को बेहतर बनाने का प्रयास करेगा।

अंततः विजयादशमी का संदेश स्पष्ट है—सत्य का साथ दीजिए, अन्याय का विरोध कीजिए और मानवीय मूल्यों की रक्षा कीजिए। सवाल केवल इतना है कि हम हर वर्ष रावण का पुतला जलाकर लौट आएंगे, या अपने भीतर की बुराइयों को भी समाप्त करने का संकल्प लेंगे? क्योंकि वास्तविक विजय उसी दिन होगी, जब सत्य केवल हमारे शब्दों में नहीं, बल्कि हमारे आचरण में भी दिखाई देगा।

spot_img
रजनी कांत पाण्डेय
रजनी कांत पाण्डेय
मैं रजनीकांत पाण्डेय पिछले कई वर्षो से पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़ा हूँ इस दौरान कई राष्ट्रिय हिंदी दैनिक समाचार पत्रों में कार्य करने के उपरान्त ख़बरों के डिजिटल माध्यम को चुना है,मेरा ख़ास उद्देश्य जन सरोकार की खबरों को प्रमुखता से उठाना है एवं न्याय दिलाना है जिसमे आपका सहयोग प्रार्थनीय है.
लेटेस्ट पोस्ट

Chandauli news- दुर्गा पूजा पंडालों की सुरक्षा पर प्रशासन की पैनी नजर, डीएम-एसपी ने किया निरीक्षण

यातायात, साफ-सफाई और प्रकाश व्यवस्था दुरुस्त रखने के निर्देश परिवर्तन टूडे न्यूज, चंदौली। दुर्गापूजा और दशहरा पर्व को शांतिपूर्ण, सुरक्षित...

ख़बरें यह भी

error: Content is protected !!
Enable Notifications OK No thanks