परिवर्तन टूडे न्यूज, चंदौली
सकलडीहा। गुरुवार को करवा चौथ का पावन पर्व श्रद्धा, आस्था और उल्लास के साथ मनाया गया। सुहागिन महिलाओं ने अपने पति की लंबी आयु, अच्छे स्वास्थ्य और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना को लेकर दिनभर निर्जला व्रत रखा। हालांकि चक्रवाती तूफान के प्रभाव और मूसलाधार बारिश के चलते आसमान में बादल छाए रहे और चंद्रमा के दर्शन नहीं हो सके। ऐसे में महिलाओं ने निर्धारित मुहूर्त के अनुसार धार्मिक परंपराओं और विधि-विधान से पूजा-अर्चना कर अपना व्रत पूर्ण किया।
सरगी से शुरू हुआ व्रत, दिनभर की पूजा-अर्चना
करवा चौथ की शुरुआत सुबह सूर्योदय से पहले सरगी ग्रहण करने के साथ हुई। महिलाओं ने सास द्वारा दिए गए सरगी के थाल में रखे फल, मिठाई, सूखे मेवे और अन्य पकवान ग्रहण कर निर्जला व्रत का संकल्प लिया। सरगी को सास-बहू के स्नेह और पारिवारिक प्रेम का प्रतीक माना जाता है।
दिनभर महिलाओं ने भगवान शिव, माता पार्वती और भगवान गणेश की आराधना की। इस दौरान महिलाएं पारंपरिक परिधानों और सोलह श्रृंगार में सजकर एक-दूसरे के घर पहुंचीं तथा सामूहिक रूप से करवा चौथ की कथा सुनी। पारंपरिक गीतों और मंगलगान से घरों में उत्सव का माहौल बना रहा।
चक्रवाती तूफान ने चांद के दीदार में डाली बाधा
शाम होते ही महिलाओं ने साड़ी, लाल चूड़ियों, मेहंदी और पारंपरिक आभूषणों से सोलह श्रृंगार किया। पूजा के थाल में करवा, दीपक, चावल और छलनी सजाकर चंद्रमा के दर्शन की प्रतीक्षा करने लगीं। लेकिन चक्रवाती तूफान के प्रभाव से हुई भारी बारिश और आसमान में घने बादलों के कारण चंद्रमा दिखाई नहीं दिया।
ऐसी परिस्थितियों में महिलाओं ने धार्मिक मान्यताओं और निर्धारित मुहूर्त का ध्यान रखते हुए विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और व्रत का पारण किया। चंद्रमा के प्रत्यक्ष दर्शन नहीं होने के बावजूद महिलाओं की श्रद्धा और आस्था में कोई कमी नहीं दिखाई दी।
पति की दीर्घायु के लिए की मंगलकामना
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, करवा चौथ का व्रत वीरवती की कथा से जुड़ा है। मान्यता है कि वीरवती ने अपने पति की दीर्घायु के लिए कठोर उपवास और तप किया था। उसकी अटूट श्रद्धा से प्रसन्न होकर यमराज ने उसके पति को पुनर्जीवन प्रदान किया। तभी से सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए यह व्रत रखती आ रही हैं।
करवा चौथ केवल उपवास का पर्व नहीं, बल्कि दांपत्य प्रेम, विश्वास, समर्पण और पारिवारिक सौहार्द का प्रतीक माना जाता है। मौसम की प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद सकलडीहा और आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं ने पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ इस पर्व को मनाया।



