121वीं जयंती पर विशेष
— डॉ. विनय प्रकाश तिवारी
चंदौली। आज 3 सितंबर को पंडित कमलापति त्रिपाठी जी की 121वीं जयंती पर उन्हें नमन करते हुए मन में सबसे पहले यही विचार आता है कि राजनीति में पद बहुत लोगों को मिलते हैं, लेकिन कद बहुत कम लोग बना पाते हैं।
पंडित कमलापति त्रिपाठी जी ऐसे ही व्यक्तित्व थे। वह उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे, देश के रेल मंत्री रहे और राष्ट्रीय राजनीति के शिखर तक पहुंचे। लेकिन चंदौली के लिए उनका परिचय इन पदों से कहीं बड़ा है। उनके राजनीतिक रूप से बड़े होने के साथ चंदौली भी बड़ा हुआ।
नहरें केवल पानी नहीं, विकास की सोच लेकर आईं
आज चंदौली को गर्व से धान का कटोरा कहा जाता है। इसके पीछे उपजाऊ मिट्टी और किसानों की मेहनत के साथ मजबूत सिंचाई व्यवस्था की भी बड़ी भूमिका है।
चंदौली में नहरों के विस्तार और सिंचाई व्यवस्था के विकास के साथ पंडित कमलापति त्रिपाठी जी का नाम पुरानी पीढ़ी आज भी सम्मान से जोड़ती है। यह केवल नहर बनाने का कार्य नहीं था, बल्कि यह सोच थी कि खेत तक पानी पहुंचेगा तो किसान की जिंदगी और पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था बदलेगी।
नहर खेत तक पहुंची तो पानी के साथ उम्मीद पहुंची, फसल पहुंची और धीरे-धीरे चंदौली को धान के कटोरे की पहचान मिली।
न प्रचार के साधन थे, न दिखावे की राजनीति
आज किसी छोटे से कार्य की तस्वीर कुछ ही मिनटों में सामाजिक माध्यमों पर पहुंच जाती है। कमलापति जी के समय न फेसबुक था, न इंस्टाग्राम, न व्हाट्सऐप और न आज जैसी प्रचार व्यवस्था। फिर भी आज गांव का बुजुर्ग किसी विकास कार्य को देखकर कह देता है—“यह काम कमलापति जी के समय हुआ था।” इससे बड़ा प्रचार किसी जननेता के लिए और क्या हो सकता है?
पोस्टर और प्रचार समय के साथ मिट जाते हैं, लेकिन जनता के जीवन में बदलाव लाने वाला काम पीढ़ियों तक याद रहता है।
दिल्ली पहुंचे, लेकिन अपनी मिट्टी को नहीं भूले
देश के रेल मंत्री के रूप में कमलापति जी ने राष्ट्रीय राजनीति में अपनी मजबूत पहचान बनाई। पूर्वांचल के लोगों को भरोसा था कि दिल्ली में उनकी आवाज को समझने और रखने वाला कोई अपना मौजूद है। बड़ा पद पाना कठिन है, लेकिन बड़े पद पर पहुंचकर अपनी मिट्टी को याद रखना उससे भी बड़ी बात है। पत्रकारिता, साहित्य और स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े उनके व्यक्तित्व में सार्वजनिक जीवन की एक अलग गरिमा दिखाई देती थी।
कमलापति जी किसी एक दल की विरासत नहीं
पंडित कमलापति त्रिपाठी कांग्रेस के बड़े नेता थे, लेकिन उनके योगदान को केवल दलगत दृष्टि से देखना उचित नहीं होगा। किसी की विचारधारा से सहमति या असहमति हो सकती है, लेकिन यदि उसके कार्यों से कई पीढ़ियों को लाभ मिला है तो उसका सम्मान अपनी मिट्टी और अपने इतिहास का सम्मान है।
वह केवल कांग्रेस की विरासत नहीं हैं।
वह पूर्वांचल की विरासत हैं।
वह चंदौली की विरासत हैं।
अब हमारी पीढ़ी की ‘नहरें’ कौन-सी होंगी?
आज समय बदल चुका है। किसान को आधुनिक कृषि और बेहतर बाजार चाहिए। युवाओं को रोजगार चाहिए। बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा चाहिए। बेहतर स्वास्थ्य, उद्योग, व्यापार और तकनीक के अवसर चाहिए। इसलिए आज चंदौली को अवसरों की नई नहरों की जरूरत है— शिक्षा की नहर, रोजगार की नहर, उद्योग की नहर, स्वास्थ्य की नहर और तकनीक की नहर। पिछली पीढ़ी ने खेतों तक पानी पहुंचाया। अब हमारी पीढ़ी की जिम्मेदारी है कि आने वाली पीढ़ियों तक अवसर पहुंचाए।
पद समाप्त होता है, काम की उम्र नहीं
कभी चंदौली की किसी नहर के किनारे खड़े होकर लहलहाते धान के खेतों को देखिए। समय बदल गया, सरकारें बदल गईं, पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन नहर में बहता पानी और खेतों की हरियाली आज भी उस विकास की कहानी कहती है।
मुख्यमंत्री का कार्यकाल समाप्त होता है। मंत्री का कार्यकाल समाप्त होता है। सांसद और विधायक का कार्यकाल भी समाप्त होता है। लेकिन जनहित में किया गया काम कभी समाप्त नहीं होता। यही पंडित कमलापति त्रिपाठी जी की सबसे बड़ी विरासत है।
आज उनकी 121वीं जयंती पर उन्हें याद करते हुए यही कहना होगा कि राजनीति में पद प्राप्त करना उपलब्धि हो सकती है, लेकिन अपने पद के माध्यम से अपनी मिट्टी के लिए ऐसा काम कर जाना, जिसे आने वाली पीढ़ियां याद रखें—वही असली विरासत है।
पंडित कमलापति त्रिपाठी जी का कद उनके पद से कहीं बड़ा था, है और रहेगा।
121वीं जयंती पर उस महान व्यक्तित्व को शत-शत नमन — डॉ. विनय प्रकाश तिवारी
संस्थापक — एलटीपी कैलकुलेटर एवं डैडीज इंटरनेशनल स्कूल


