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Thursday, October 29, 2026
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हरितालिका तीज : शिव को पाने की तपस्या से जुड़ा है तीज का पर्व

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रजनी कांत पाण्डेय
रजनी कांत पाण्डेय
मैं रजनीकांत पाण्डेय पिछले कई वर्षो से पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़ा हूँ इस दौरान कई राष्ट्रिय हिंदी दैनिक समाचार पत्रों में कार्य करने के उपरान्त ख़बरों के डिजिटल माध्यम को चुना है,मेरा ख़ास उद्देश्य जन सरोकार की खबरों को प्रमुखता से उठाना है एवं न्याय दिलाना है जिसमे आपका सहयोग प्रार्थनीय है.

शिव-पार्वती के दिव्य मिलन की स्मृति में सजता है आस्था का संसार, सुहागिनों के श्रृंगार में झलकता है प्रेम

परिवर्तन टुडे न्यूज
Story By- प्राची राय
वाराणसी। सावन की हरितिमा जब धरती के आंचल में उतरती है और वर्षा की बूंदें प्रकृति के माथे पर मोतियों की तरह चमकने लगती हैं, तब भारतीय संस्कृति का आकाश पर्वों की रंग-बिरंगी छटा से आलोकित हो उठता है। इन्हीं पर्वों की श्रृंखला में हरितालिका तीज नारी मन की श्रद्धा, प्रेम, प्रतीक्षा और समर्पण को अभिव्यक्ति देने वाला महत्वपूर्ण पर्व है। यह केवल व्रत और पूजा का अवसर नहीं, बल्कि भगवान शिव और माता पार्वती के शाश्वत मिलन की उस कथा का स्मरण है, जिसमें तपस्या, विश्वास और अटूट प्रेम का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है।

भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला हरितालिका तीज पर्व विशेष रूप से सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, अखंड सौभाग्य, सुखी दांपत्य जीवन और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना से व्रत रखती हैं। अनेक महिलाएं निर्जला व्रत भी करती हैं और पूरे दिन भगवान शिव तथा माता पार्वती की आराधना में लीन रहती हैं।

माता पार्वती की कठोर तपस्या से जुड़ी है पर्व की कथा

हरितालिका तीज की मूल भावना माता पार्वती की उस कठोर साधना से जुड़ी है, जिसके माध्यम से उन्होंने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने का संकल्प लिया था। हिमालय की पुत्री पार्वती के हृदय में भगवान शिव को पाने की ऐसी अटूट अभिलाषा थी, जिसके सामने कठिन से कठिन तपस्या भी छोटी प्रतीत होती थी।

मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को प्रसन्न करने के लिए वर्षों तक कठोर तप किया। उन्होंने सुख-सुविधाओं का त्याग कर अपने आराध्य के प्रति अटूट निष्ठा बनाए रखी। उनकी तपस्या और संकल्प अंततः सफल हुए तथा भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया।

शिव-पार्वती का यह मिलन केवल दो व्यक्तियों का मिलन नहीं, बल्कि शिव और शक्ति, प्रकृति और पुरुष तथा प्रेम और समर्पण के शाश्वत संबंध का प्रतीक माना जाता है। इसी पावन प्रसंग को स्मरण करते हुए महिलाएं हरितालिका तीज पर भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा कर अपने दांपत्य जीवन में प्रेम, सौहार्द और सुख-शांति की कामना करती हैं।

सोलह श्रृंगार में झलकती है सावन की उमंग

हरितालिका तीज आते ही महिलाओं में उत्सव का उल्लास दिखाई देने लगता है। हरे, लाल और पीले रंग के परिधानों में सजी महिलाएं हाथों में मेहंदी रचाती हैं। चूड़ियों की खनक, पायल की रुनझुन, माथे की बिंदी और मांग का सिंदूर पर्व की सुंदरता को और निखार देते हैं।

सोलह श्रृंगार इस पर्व का विशेष आकर्षण होता है। महिलाएं एक-दूसरे को मेहंदी लगाती हैं, तीज के पारंपरिक गीत गाती हैं और झूले पर बैठकर सावन की उमंग का आनंद लेती हैं। लोकगीतों में कहीं मायके की याद झलकती है तो कहीं प्रियतम के प्रति प्रेम और सखियों के साथ बिताए बचपन की स्मृतियां जीवंत हो उठती हैं।

तीज के लोकगीत नारी मन की उन भावनाओं को स्वर देते हैं, जिन्हें सामान्य परिस्थितियों में शब्दों में व्यक्त करना कठिन होता है। यही कारण है कि तीज के गीत केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही लोक संस्कृति और नारी संवेदनाओं की जीवंत धरोहर बन चुके हैं।

शिव-पार्वती की आराधना में समर्पित होता है मन

हरितालिका तीज के दिन महिलाएं प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं। पूजा स्थल को सजाकर भगवान गणेश, भगवान शिव और माता पार्वती की विधि-विधान से पूजा की जाती है। कई स्थानों पर मिट्टी से भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमाएं बनाकर उनके पूजन की भी परंपरा है।

भगवान शिव को बेलपत्र, पुष्प, धतूरा आदि अर्पित किए जाते हैं, जबकि माता पार्वती को सुहाग की सामग्री अर्पित कर अखंड सौभाग्य की कामना की जाती है। धूप-दीप की सुगंध और मंत्रोच्चार से वातावरण भक्तिमय हो उठता है। तीज की कथा का श्रवण करने के बाद आरती की जाती है और परिवार की सुख-शांति तथा समृद्धि के लिए प्रार्थना की जाती है।

इस पर्व की पूजा में सबसे महत्वपूर्ण स्थान श्रद्धा और भावना का है। पूजा की थाली में रखे पुष्प और दीपक जितने सुंदर होते हैं, उससे कहीं अधिक पवित्र वह भावना होती है, जिसके साथ महिलाएं अपने परिवार और प्रियजनों के मंगल की कामना करती हैं।

मायके और ससुराल के बीच स्नेह का सेतु है तीज

समय के साथ पर्वों के स्वरूप में बदलाव आया है, लेकिन उनके भीतर छिपी भावनाएं आज भी उतनी ही जीवंत हैं। हरितालिका तीज महिलाओं को अपनी जड़ों, लोक परंपराओं और पारिवारिक संस्कारों से जोड़ने का कार्य करती है।

नवविवाहित महिलाओं के लिए यह पर्व विशेष उत्साह लेकर आता है। मायके से आने वाली साड़ी, श्रृंगार सामग्री, फल, मिठाई और अन्य उपहार केवल वस्तुएं नहीं होते, बल्कि बेटी के प्रति माता-पिता के स्नेह, आशीर्वाद और अपनत्व का प्रतीक होते हैं। इस प्रकार तीज मायके और ससुराल के बीच प्रेम और आत्मीयता का सेतु भी बन जाती है।

व्रत के समापन पर होता है पारण

हरितालिका तीज का व्रत सामान्यतः अगले दिन चतुर्थी तिथि में पूजा-अर्चना के बाद पारण के साथ पूर्ण किया जाता है। महिलाएं प्रातः स्नान कर भगवान शिव और माता पार्वती का पुनः स्मरण एवं पूजन करती हैं। व्रत पूर्ण होने की प्रार्थना करने के बाद जल ग्रहण कर पारण किया जाता है।

व्रत की कठिन साधना के बाद पारण का क्षण महिलाओं के लिए विशेष भावनात्मक होता है। यह केवल उपवास समाप्त करने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि श्रद्धा और संकल्प की पूर्णता का प्रतीक माना जाता है।

आस्था के साथ संवेदना और संस्कारों का पर्व

हरितालिका तीज का सौंदर्य केवल व्रत, पूजा और श्रृंगार तक सीमित नहीं है। इसकी वास्तविक सुंदरता उस भावना में निहित है, जिसमें एक नारी अपने परिवार और प्रियजनों के सुख, स्वास्थ्य और मंगल की कामना करती है।

भगवान शिव और माता पार्वती की कथा अटूट विश्वास, धैर्य और समर्पण का संदेश देती है। भारतीय परंपरा में शिव और शक्ति को एक-दूसरे का पूरक माना गया है। दोनों का मिलन जीवन में संतुलन, सामंजस्य और पूर्णता का प्रतीक है।

जब तीज के अवसर पर पूजा स्थल दीपों से जगमगाता है, महिलाएं सोलह श्रृंगार कर भगवान शिव और माता पार्वती की आराधना करती हैं और चारों ओर तीज के लोकगीतों की मधुर गूंज सुनाई देती है, तब सदियों पुरानी भारतीय परंपरा वर्तमान के आंगन में जीवंत होती दिखाई देती है।

हरितालिका तीज इसलिए केवल एक व्रत नहीं, बल्कि प्रेम की प्रार्थना, विश्वास की शक्ति और समर्पण की दीपशिखा है, जो पीढ़ियों से भारतीय संस्कृति और पारिवारिक मूल्यों को आलोकित करती आ रही है।

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रजनी कांत पाण्डेय
रजनी कांत पाण्डेय
मैं रजनीकांत पाण्डेय पिछले कई वर्षो से पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़ा हूँ इस दौरान कई राष्ट्रिय हिंदी दैनिक समाचार पत्रों में कार्य करने के उपरान्त ख़बरों के डिजिटल माध्यम को चुना है,मेरा ख़ास उद्देश्य जन सरोकार की खबरों को प्रमुखता से उठाना है एवं न्याय दिलाना है जिसमे आपका सहयोग प्रार्थनीय है.
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