परिवर्तन टुडे ……
Story By- सुशी सक्सेना इन्दौर मध्यप्रदेश
कौन कहता है कि सपना साकार नहीं होता।
क्या पानी का कोई भी, आकार नहीं होता।
जिसका कोई नहीं होता उसका भगवान होता है, यह कहावत सुन रखी थी मगर सच होते हुए मैंने तब देखी जब मैं पहली बार एक ‘ सपनों के घर ‘ नाम के अनाथालय में गई। यह वह जगह थी जहां जाति, धर्म से परे सभी पराए होकर भी अपने लगते थे। सभी एक परिवार की तरह मिल जुल कर रहते थे। मेरी अब तक की साहित्यिक यात्रा में साहित्य के क्षेत्र में आकर भी परिवार की कमी पूरी हुई है। जब कोई वरिष्ठ साहित्यकार या साहित्यकारा मुझे बेटी कह कर बुलाता तो माता पिता की कमी का अहसास दूर हो जाता। और बहुत से साथी लेखकों ने, भाई, बहन और एक अच्छे दोस्त होने की भूमिका भी निभाई है। इसके बावजूद भी कहीं न कहीं दिल में अनाथ होने का भाव छुपा हुआ है। जो मेरे इस दिल को अक्सर एक अजीब तरह से खाली कर देता है। और इस खालीपन को भरने के लिए मैंने फैसला लिया कि मैं भी अनाथालय से जुड़ुंगी। और इस राह में काफी हद तक सफलता भी प्राप्त की है।

वहां मेरी मुलाकात प्रकाश से हुई, उसका नाम तो प्रकाश था मगर उसकी जिंदगी में सिर्फ अंधेरा ही अंधेरा था क्योंकि वह जन्म से ही देख नहीं सकता था। एक ऐसा लड़का जो पूरे जोश और आत्मविश्वास से भरा हुआ जिसे देखकर कोई नहीं कह सकता था कि वह दृष्टि हीन है। उसकी छवि ऐसी थी कि एक बार देखते ही हर किसी के सीधे दिल में उतर जाती थी। वह आम लोगों की तरह व्यवहार करता था। डांस करना, पेंटिंग, सिंगिंग यहां तक की लेखन कार्य में भी उसकी बहुत रूचि थी। अनाथालय में भी वह सभी कार्यकर्ताओं की वहां के कामों में बहुत मदद करता था। पूरे अनाथालय में उसकी बहुत प्रशंसा सुन रखी थी।
हर त्यौहार में वहां के बच्चों के साथ समय बिताना और उन्हें उपहार देने के सिलसिले में मेरा वहां जाना चलता रहता था। वह देख नहीं सकता इस बात का पता मुझे तब चला जब वह मेरी स्कूटी के नीचे आते आते रह गया। उसे देखकर ऊपर वाले से थोड़ी सी नाराजगी जताई कि इतनी सुन्दर कृति का निर्माण करने के बाद ये कमी क्यों रखी उसने। खैर दाग तो चांद में भी होता है। फिर ये सोचकर थोड़ा शुक्रिया का भाव भी आया कि शायद भगवान ने प्रकाश को गौड गिफ्ट के रूप में इतने सारे हुनर इसलिए बक्शे हैं, ताकि वह अपनी इस अंधेरी दुनिया में भी अपना नाम रोशन कर सके। और वह अपने अधूरे ख्वाबों को पूरा करने के लिए प्रयासरत भी है।
आज भी जब मैं अनाथालय जाती हूं तो प्रकाश से जरूर मिलती हूं। उससे मिलने के बाद मुझमें भी इस बात का आत्मविश्वास जागता है कि जब वह दृष्टि हीन होते हुए भी सब कुछ कर गुजरने की क्षमता रखता है तो मैं संपूर्ण होते हुए क्यों नहीं कर सकती। और खुद में एक अपराधबोध को भी महसूस करती हूं कि मैं पूरी तरह संपूर्ण होते हुए भी इस बात के लिए अक्सर रोया करती हूं कि दुनिया में कोई सहारा नहीं देता। परन्तु प्रकाश को इस बात का बिल्कुल भी मलाल नहीं है कि वह देख नहीं सकता। उसका कहना है कि जिंदगी जैसी भी है अच्छी है क्योंकि वह भगवान का दिया हुआ उपहार है। और उपहार अच्छा या बुरा नहीं होता।
” सात रंगों के सपनों की दुनिया तो सबको भाती है।
बड़ी बात तो तब होगी, जब जीवन के इस,
काले रंग को भी हंस के अपना ले कोई।
बनी बनाई राहों पर चलकर मंजिल मिल जाती आसानी से।
बड़ी बात तो तब होगी, पत्थरों का सीना
चीरकर एक नई राह बना ले कोई। “
लेखक- सुशी सक्सेना इंदौर मध्यप्रदेश




