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Saturday, June 20, 2026

सन्ध्याचल भगवान भास्कर को व्रतियों ने दिया अर्ध्य: छठ मईया के गीतों से भक्तिमय हुआ क्षेत्र

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रजनी कांत पाण्डेय
रजनी कांत पाण्डेय
मैं रजनीकांत पाण्डेय पिछले कई वर्षो से पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़ा हूँ इस दौरान कई राष्ट्रिय हिंदी दैनिक समाचार पत्रों में कार्य करने के उपरान्त ख़बरों के डिजिटल माध्यम को चुना है,मेरा ख़ास उद्देश्य जन सरोकार की खबरों को प्रमुखता से उठाना है एवं न्याय दिलाना है जिसमे आपका सहयोग प्रार्थनीय है.

भगवान भास्कर दिखाई न देने व्रती हुए मायूस

परिवर्तन टुडे चन्दौली
Story By- मनोज कुमार मिश्रा
चहनियां। चार द्विवसीय डाला छठ के तीसरे दिन सोमवार को सायमकाल ब्रतियों ने आस्था से सरोबार सन्ध्याचल भगवान भास्कर को अर्ध्य दिया। जिससे गंगा घाटां, सरोवरां, नहरों व तालाबां पर ब्रती महिलाएं एवं पुरूषों का ताता लगा रहा। डाला छठ में विशेष रूप से तिसरे दिन भगवान भास्कर को अस्ताचल व चौथे दिन भगवान उदयाचल अर्ध्य दिया जाता है। क्षेत्र के बाबा कीनाराम मानसरोवर, टाण्डाकला, तिरगांवा, मारूफपुर, महुअरकला, पूरागनेश, नादी निधौरा, सैफपुर, रामगढ़ बलुआ, कांवर, सहित गंगा तटीय गावों में व मैदानी क्षेत्रो के गावों में ब्रतियों ने गंगा तटों, तालाबो, सरोवरो, नहरो, कुंडों में पूजन अर्चन किया।

वही सुरक्षा की दृष्टि के मद्देनजर उपजिलाधिकारी सकलडीहा कुन्दन राज, क्षेत्राधिकारी स्नेहा तिवारी व बलुआ थानाध्यक्ष अतुल प्रजापति ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम में लगे रहे। वही प्रशासन द्वारा गोता खोरो की व्यवस्था, प्रकाश की व्यावस्था, गंगा में बैरिकेटिग इत्यादि के पुख्ता इंतजाम किया गया था तथा साथ ही बलुआ गंगा घाट पर पर्याप्त पुलिस बल की व्यवस्था की गयी थी। वाहनों को बालमीकि इण्टर कालेज के प्रागण में पार्किग बनाई गयी थी। जहां छोटे-बड़े सभी प्रकार के बाहन को वही रोक दिया गया था।

सोमवार की शाय लगभग 2बजे से व्रतियां का बलुआ घाट पर आवागमन प्रारम्भ हो जहा 4बजते-बजते पैर रखने तक की जगह नही बची। आशा से ज्याद भीड़ जुट जाने के कारण प्रशासन को भीड़ नियंत्रण करने कठिनाइयो का सामना करना पड़ा।

भगवान भास्कर दिखाई न देने व्रती हुए मायूस

आकाश में बादल छाये रहने के कारण व्रति महिलाओ को अर्ध्य देने में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जहा व्रति महिलाएं भगवान सूर्य एक झलक देखने के लालाइत थी लेकिन भगवान भास्कर के दिखायी न देने उनके चेहरे पर मायूसी छायी रही।

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रजनी कांत पाण्डेय
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