परिवर्तन टुडे न्यूज, चंदौली। जनपद के ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में शनिवार को जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) पर्व श्रद्धा और आस्था के साथ मनाया गया। माताओं ने संतान की दीर्घायु, उत्तम स्वास्थ्य, सुख-समृद्धि और सुरक्षा की कामना को लेकर विधि-विधान से पूजन-अर्चन किया। अनेक महिलाओं ने निर्जला व्रत रखकर दिनभर भगवान की आराधना की और व्रत की कथा सुनी। पर्व को लेकर घरों में सुबह से ही धार्मिक वातावरण बना रहा।
संतान की लंबी आयु के लिए रखा कठिन व्रत
जीवित्पुत्रिका व्रत हिंदू धर्म की प्रमुख व्रत परंपराओं में माना जाता है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को माताएं अपनी संतान के दीर्घ और सुखमय जीवन की कामना से यह व्रत रखती हैं। मान्यता के अनुसार यह व्रत अत्यंत कठिन होता है। व्रती महिलाएं निर्धारित अवधि तक अन्न और जल का त्याग कर संतान की मंगलकामना के लिए भगवान की आराधना करती हैं।
जनपद के विभिन्न गांवों और कस्बों में महिलाओं ने सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर व्रत का संकल्प लिया। इसके बाद घरों और पूजा स्थलों पर विधि-विधान से पूजन-अर्चन किया गया। महिलाओं ने जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा का श्रवण कर अपने पुत्रों की लंबी आयु और परिवार की सुख-शांति की कामना की।
जीमूतवाहन के त्याग की कथा से जुड़ी है मान्यता
जीवित्पुत्रिका व्रत से जुड़ी एक प्रमुख कथा गंधर्व राजकुमार जीमूतवाहन से संबंधित है। मान्यता है कि जीमूतवाहन अत्यंत दयालु और परोपकारी थे। उन्होंने अपना राजपाट भाइयों को सौंप दिया और वन में रहने लगे। वहां उन्होंने एक वृद्ध नाग माता को विलाप करते देखा। नाग माता अपने इकलौते पुत्र को गरुड़ के समक्ष बलि दिए जाने की आशंका से दुखी थीं।
नाग माता के पुत्र की रक्षा के लिए जीमूतवाहन स्वयं बलि देने के लिए तैयार हो गए। उन्होंने अपने शरीर को लाल वस्त्र से ढककर गरुड़ के सामने स्वयं को प्रस्तुत कर दिया। जीमूतवाहन के त्याग और परोपकार की भावना से गरुड़ देव प्रसन्न हुए। उन्होंने जीमूतवाहन के प्राणों की रक्षा की और नागों की बलि न लेने का वचन दिया। इसी कथा को संतान की रक्षा और दीर्घायु की कामना से जुड़े इस व्रत की प्रमुख मान्यताओं में गिना जाता है।
उत्तरा और राजा परीक्षित की कथा भी प्रचलित
जीवित्पुत्रिका पर्व से महाभारत काल की एक अन्य कथा भी जुड़ी हुई है। मान्यता के अनुसार महाभारत युद्ध के बाद अश्वत्थामा ने प्रतिशोध की भावना से उत्तरा के गर्भ में पल रहे शिशु को नष्ट करने के लिए ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया था। इससे गर्भस्थ शिशु की मृत्यु हो गई।
कथा के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति और पुण्य प्रभाव से उत्तरा के गर्भ में उस शिशु को पुनर्जीवित किया। गर्भ में मृत्यु के बाद पुनः जीवन प्राप्त करने के कारण वह बालक आगे चलकर राजा परीक्षित के नाम से प्रसिद्ध हुआ। इसी मान्यता के आधार पर संतान के जीवन और उसकी रक्षा के लिए जीवित्पुत्रिका व्रत की परंपरा का उल्लेख किया जाता है।
घरों में रही आस्था और भक्ति की छटा
पर्व के अवसर पर महिलाओं ने सामूहिक रूप से पूजन-अर्चन कर व्रत कथा सुनी। कई स्थानों पर महिलाओं ने एक-दूसरे को पर्व की शुभकामनाएं दीं। दिनभर निर्जला व्रत रखने के दौरान महिलाओं ने संतान के उज्ज्वल भविष्य और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए प्रार्थना की। ग्रामीण क्षेत्रों में भी पर्व को लेकर विशेष उत्साह दिखाई दिया। शाम तक विभिन्न घरों में पूजा-पाठ का क्रम चलता रहा और वातावरण धार्मिक आस्था से सराबोर रहा।


