पहाड़ी क्षेत्रों से गांवों तक घटती जा रही कोयल की मौजूदगी
परिवर्तन टुडे डेस्क
चंदौली। एक समय था जब जनपद के चकिया नौगढ़ समेत पहाड़ी इलाकों से लेकर गांवों तक सुबह की शुरुआत कोयल की मीठी कूक से होती थी। आम के बागों, पीपल और बरगद के पेड़ों पर बैठी कोयल की आवाज लोगों के मन को सुकून देती थी। लेकिन अब हालात ऐसे हो गए हैं कि गांवों में कोयल की आवाज सुनना दुर्लभ होता जा रहा है।
लगातार हो रही पेड़ों की कटाई, खत्म होते बाग-बगीचे और घटती हरियाली ने कोयल के प्राकृतिक आशियाने को उजाड़ दिया है। गांवों में जहां पहले दर्जनों पेड़ों पर पक्षियों का बसेरा रहता था, वहां अब कंक्रीट और खाली मैदान नजर आने लगे हैं। इसका असर सीधे तौर पर कोयल समेत कई पक्षियों की प्रजातियों पर पड़ रहा है।
ग्रामीण बताते हैं कि पहले गर्मी के मौसम में कोयल की कूक पूरे वातावरण को जीवंत बना देती थी। सुबह और शाम गांवों में उसकी आवाज आम बात थी, लेकिन अब कई-कई दिनों तक कोयल दिखाई या सुनाई नहीं देती। बुजुर्गों का कहना है कि बदलते पर्यावरण और अंधाधुंध कटान ने गांव की प्राकृतिक पहचान ही बदल दी है।
पर्यावरण जानकारों के अनुसार कोयल ऐसे क्षेत्रों में रहना पसंद करती है जहां घने पेड़, शांत वातावरण और पर्याप्त हरियाली हो। लेकिन जंगलों और बागों के लगातार खत्म होने से पक्षियों का जीवन संकट में पड़ता जा रहा है। अगर समय रहते हरियाली बचाने की दिशा में गंभीर पहल नहीं हुई तो आने वाले वर्षों में कोयल की मधुर आवाज सिर्फ कहानियों और किताबों तक सीमित होकर रह जाएगी।
ग्रामीणों और पर्यावरण प्रेमियों ने प्रशासन से अवैध कटान रोकने, पुराने पेड़ों को संरक्षित करने और बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण कराने की मांग की है, ताकि गांवों की खोती प्राकृतिक पहचान और पक्षियों की चहचहाहट फिर लौट सके।


