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Tuesday, October 27, 2026
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रिश्तों का महापर्व रंगोत्सव: समय के साथ होली का बदल रहा स्वरूप

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रजनी कांत पाण्डेय
रजनी कांत पाण्डेय
मैं रजनीकांत पाण्डेय पिछले कई वर्षो से पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़ा हूँ इस दौरान कई राष्ट्रिय हिंदी दैनिक समाचार पत्रों में कार्य करने के उपरान्त ख़बरों के डिजिटल माध्यम को चुना है,मेरा ख़ास उद्देश्य जन सरोकार की खबरों को प्रमुखता से उठाना है एवं न्याय दिलाना है जिसमे आपका सहयोग प्रार्थनीय है.

परिवर्तन टुडे डेस्क
चंदौली। रिश्तों का महापर्व रंगोत्सव का स्वरूप अब दिन-प्रतिदिन बदलता और बिगड़ता नजर आ रहा है। जहां कभी यह पर्व आपसी प्रेम, सौहार्द और मेल मिलाप का प्रतीक हुआ करता था, वहीं अब कई स्थानों पर यह सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गया है।

बुजुर्गों का कहना है कि पहले की होली में आत्मीयता झलकती थी और लोग पूरे उत्साह के साथ एक पखवारे पहले से ही तैयारियों में जुट जाते थे। फागुन लगते ही गांवों में होलिका निर्माण की तैयारियां शुरू हो जाती थीं। बच्चे और युवा मिलकर टोलियां बनाते, होलिका का आदरपूर्वक निर्माण करते और चट्टी-चौराहों व मंदिरों पर रात के समय फाग और चैता की मधुर ध्वनियां गूंजती थीं। अबीर, गुलाल, केसर और ठंडई के साथ लोग एक-दूसरे के घर जाकर शुभकामनाएं देते थे। वातावरण में अपनापन और पारंपरिक उल्लास झलकता था।

लेकिन बदलते समय के साथ होली का स्वरूप भी बदल गया है। नई पीढ़ी के कुछ लोग अबीर गुलाल की जगह केमिकल युक्त रंग, पेंट, कीचड़ और यहां तक कि गोवर का प्रयोग कर होली मनाने लगे हैं, जिसे बुजुर्ग परंपरा से विचलन मानते हैं। उनका कहना है कि इस तरह की हरकतों से आपसी रिश्तों में दरार पड़ती है और त्योहार की गरिमा प्रभावित होती है। गांव और शहरों में अब संभ्रांत परिवारों का होली के दिन घरों से कम निकलना भी सामाजिक दूरी का संकेत माना जा रहा है।

नामवर मिश्रा का कहना है कि पुराने जमाने की होली और आज की होली में जमीन-आसमान का अंतर है। उनके अनुसार अब त्योहार में हुड़दंग अधिक और आत्मीयता कम दिखाई देती है। वहीं 85 वर्षीय हीरामन प्रजापति बताते हैं कि फागुन के आगमन के साथ ही गांवों में होलियाना माहौल बन जाता था और लोग एक पखवारे तक फाग गीत गाते थे। पूर्व प्रधान हरगेन मिश्र का कहना है कि पहले लोग प्राकृतिक चीजों का उपयोग करते थे। उबटन और प्राकृतिक रंग न केवल स्वास्थ्य की रक्षा करते थे बल्कि परंपरा को भी जीवित रखते थे। 72 वर्षीय ईश्वरीय नारायण के अनुसार होलिका दहन बुराइयों और रोगों को दूर करने का प्रतीक है तथा उसमें उत्तम वस्तु अर्पित करना त्याग और शुद्धि का संदेश देता है।

बुजुर्गों का मानना है कि होली का वास्तविक स्वरूप प्रेम, भाईचारे और सामाजिक एकता में निहित है। आवश्यकता इस बात की है कि नई पीढ़ी त्योहार की मूल भावना को समझे और रंगोत्सव को उसकी गरिमा के अनुरूप मनाए, ताकि यह परंपरा आने वाली पीढ़ियों तक उसी आत्मीयता के साथ पहुंच सके।

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रजनी कांत पाण्डेय
रजनी कांत पाण्डेय
मैं रजनीकांत पाण्डेय पिछले कई वर्षो से पत्रकारिता के क्षेत्र से जुड़ा हूँ इस दौरान कई राष्ट्रिय हिंदी दैनिक समाचार पत्रों में कार्य करने के उपरान्त ख़बरों के डिजिटल माध्यम को चुना है,मेरा ख़ास उद्देश्य जन सरोकार की खबरों को प्रमुखता से उठाना है एवं न्याय दिलाना है जिसमे आपका सहयोग प्रार्थनीय है.
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